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बच्चों के साथ कला सृजन
कभी कभी लगता है जैसे हमने बड़े होकर जीना ही छोड़ दिया है। उम्र के बढ़ने के साथ हमने खुद को ऐसी गंभीरता के मकड़जाल में फंसा लिया है कि हम चाहकर भी उससे बाहर नहीं आ पाते। इस गंभीरता को बनाए रखने के चक्कर में हम उन छोटी छोटी खुशियों को भी दबा देते हैं जो हमारी बड़ी खुशियों का आधार बन सकती हैं। इसीलिए कई बार लगता है कि हमसे तो अच्छे बच्चे हैं जो छोटी छोटी चीजों में भी खुशी ढूंढ लेते हैं।
पिछले दिनों एक स्कूल में बच्चों के साथ रेखाओं व रंगों के साथ खेलने का अवसर मिला। खेलना, हाँ वह एक तरह का खेलना ही था। बच्चे अपनी तरह से खेलना चाहते थे और मैं उनकी चाहत से सहमत था। अक्सर स्कूलों में यह होता है कि बच्चों को अनुशासन के नाम पर या पाठ्यक्रम के नाम पर उनकी कल्पनाशक्ति को, उनकी सीखने की आजादी को रोकने का काम किया जाता है। चित्रकला शिक्षा में तो बच्चों को गणित के सूत्रों की तरह रटाने का प्रयास किया जाता है। मेरी कोशिश होती है कि बच्चों को वह करने दूँ जो वे करना चाहते हैं। मैं बस उन्हें कुछ सूत्र देता हूँ जिनके सहारे वे अपनी रचनात्मक यात्रा शुरू कर सकें। नतीजा भले ही कुछ न निकले या मनचाहा न निकले पर मुझे लगता है कि सीखने-सिखाने का यही सही तरीका हो सकता है क्योंकि यहीं से वह मोड़ शुरू होता है जहाँ से सिखाने वाला व सीखने वाला एक ही रास्ते पर चलना शुरू करते हैं।
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17/03/2018
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